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दो कबूतर कथायें

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कबूतर कथा एक - हट एमपीबाजी करता है
कबूतर अपनी कबूतरी को घर छोड़ गया, इसमें नयी बात नहीं थी।
कबूतर अपनी कबूतरी को अकसर घर छोड़कर जाया करता था। पर जबसे कबूतर दिल्ली आने-जाने लगा था, तब से उसके चाल-चलन में तब्दीली आने लगी थी।

कबूतर जब से दिल्ली गया था, दिल्ली की हवा लग गयी थी। दिल्ली के कबूतर और इलाकों के कबूतरों से थोड़े अलग होते थे।

बाकी इलाकों के कबूतर अपनी-अपनी कबूतरी में मगन रहते थे। या कहा जाये कि इसके अलावा उनके पास चारा नहीं था। चारा न हो, तो भैंस उपवास घोषित करके धार्मिक बन सकती है। दूसरी कबूतरियों के विकल्प उपलब्ध न हों, तो कबूतर खुद को एक कबूतरी-व्रता घोषित कर सकते हैं। वैसे, ऐसा वो आदमी भी करते हैं, जिन्हे सतत लाइन-मारण प्रक्रिया का कोई रिस्पांस नहीं मिलता, वे प्रेम की निरर्थकता पर भारी प्रवचन दे सकते हैं। वे खुद को ब्रह्मचारी भी घोषित कर सकते हैं। और भी न जाने क्या-क्या कर सकते हैं। पर कबूतर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, वो सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपनी कबूतरी को लगातार सतत बार-बार विश्वास दिलायें कि सिर्फ वही एक कबूतरी है उनकी जिंदगी में।

वैसे कबूतरों की दुनिया में थोड़े टेंशन कम इसलिए थे कि वहां इस तरह के सीरियल बनना शुरु नहीं हुए थे, जिसमें प्रति कबूतर कम से कम चार अफेयर दिखाये जायें। या एक कबूतरी दूसरी कबूतरी के कबूतर को ले उड़ने के लपेटे में रहती हो। क नाम से बनने वाले सीरियलों का कहर कबूतरों की दुनिया से दूर ही था।
सो सीरियलों से दूर कबूतर-कबूतरी गुटरगूं करते थे। मजे से रहते थे। पर उस कबूतरी का भाग्य, उसका कबूतर दिल्ली चला गया।

खैर वह कबूतर दिल्ली जाकर, एमपी बनकर बहुत बदल गया था।
एक दिन एयरपोर्ट पर कुछ देसी कबूतर गुटरगूं कर रहे थे। गुटरगूं क्या , डिस्कवरी चैनल में दिखायी जाने वाली अमेरिकन कबूतरियों के सौंदर्य की चर्चा कर रहे थे। बस चर्चा भर कर रहे थे कि उन्होने देखा कि उनका एमपी कबूतर एक दूसरी कबूतरी को लेकर उड़ने के चक्कर में था।

एयरपोर्ट अफसर लोगों ने पूछा-कौन है।
एमपी कबूतर ने कहा जी बिलकुल अपनी ही कबूतरी है। सौ टका अपनी कबूतरी है।
जिसे कबूतर अपना कह रहा था, वह थोड़ा सा घबरा रही थी।
पर एमपी हो चुका कबूतर खुर्राट हो चुका था। वह फिर बोला-जी यह मेरी कबूतरी है।
सारे देसी कबूतरों के मुंह से एक साथ निकला-अबे तू तो एमपी बाजी कर रहा है।

इसके बाद कबूतर पंचायत में फैसला लिया गया कि अब से जो कबूतर दूसरी कबूतरी को अपना बतायेगा, उसे कहा जायेगा कि यह एमपीबाजी करता है। और उसे कबूतर ना मानकर एमपी माना जायेगा और बिरादरी-बदर कर दिया जायेगा।

तब से कबूतरों की बिरादरी में परायी कबूतरियों पर तांक-झांक करने वाले को एमपी कहा जाता है।

कबूतर कथा दो-एमपीबाजी अब नहीं रुकेगी
सो साहब, कबूतरों की बिरादरी में एमपी टाइप कबूतर चल निकले थे।
 शरीफ किस्म की जिंदगी को बोरिंग बताते हुए एमपी टाइप कबूतर पेज थ्री की पार्टियों में जाते थे। अपने कैरेक्टर में ढील देते थे, डीलरों को तरह-तरह के डील देते थे। डीलरों को फायदा हो जाये, इसके लिए साथी कबूतरों के परों को भी छील देते थे।

पेज थ्री टाइप के कबूतर खूब नोट कमाते थे। फिर इलेक्शन में वोट कमाते थे। फिल्मों में काम करने वाली कबूतरियों को अपनी इलेक्शन सभाओं में ले जाते थे। उनका डांस करवाते थे। जब कबूतर बिरादरी खाने के लिए दाने की समस्या से जूझ रही होती, तो पेज थ्री के नौजवान कबूतर आपस में कुछ इस किस्म की गुटर-गूं करते थे।

"अबे तेरे गले का हार तो बहुत महंगा है कित्ते किलो दाने देकर खरीदा। सौ कुंतल या दो सौ कुंतल।"
"शटअप मैं समाजवादी कबूतर हूं। इतना वेस्ट नहीं करता कि दौ कुंतल दाने देकर हीरे का यह हार खरीदूं। मैंने यह हार "सिर्फ एक सौ अस्सी कुंतल दाने देकर खऱीदा है।"
"हा हा हा हा।"
"ही ही ही ही।"

खूब पेज थ्री ही ही होती।
एक दिन एक सीडी बाजार में आयी, जिसमें एक कबूतर को तरह –तरह की कबूतरियों से ऐसी-वैसी बातें करता हुआ दिखाया गया।
दूसरे दिन दूसरी सीडी बाजार में आयी, जिसमें उसके प्रतिद्वंदी कबूतर को तरह-तरह के डील में कमीशन मांगते हुए दिखाया गया।
पूरी कबूतर बिरादरी में सीडी चर्चा फैल गयी। सारे बच्चे सीडी देखने की मांग करने लगे।
बुजुर्ग कबूतरों ने पंचायत की और कहा कि कबूतरों को यह हरकतें शोभा नहीं देती, यह तो एमपीबाजी है।
इस पर कुछ कबूतरों ने कहा, तो क्या दिक्कत है, तमाम एमपी कबूतरबाजी कर रहे हैं, तो कबूतर एमपीबाजी क्यों नहीं कर सकते।
सीनियर कबूतर निरुत्तर थे।
अब कबूतरों को फुलमफुल एमपीबाजी करने से कोई नहीं रोक सकता।

आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
मोबाइल-9810018799

Comments (1 posted):

समीर लाल on 07 May, 2007 04:50:23
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वाह कबूतरबाजी कहें कि एम पी बाजी-दोनों पहलू धांसू हैं. बधाई!!

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