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सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाकात

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ऐसा बहुत कम होता है कि हम सबेरे सोने के अलावा और कोई काम करें। हमें इसीलिये सारे योगासनों में शवासन /निद्रासन बहुत भाता है। इसे हम तब से करते आ रहे हैं जब इस देश में बाबा रामदेव का हल्ला/हमला भी नहीं हुआ था। एक बार आसन जमाया तो घंटे भर से पहले उससे बाहर नहीं आते। इसीलिये हम चुस्त-दुरुस्त रहने का दावा भले न करें लेकिन रहते टिचन्न हैं।

एक दिन हम सबेरे उठे तो ऐसा उठे कि शवासन का ध्यान ही नहीं रहा और पता नहीं किस आवेश में सड़क पर आकर मार्निंग वाक के हथकंडे में फंस गये और टहलने लगे। देखा लोग सड़क पर लपकते चल रहे हैं। लोग अपने को उछालते हुये घर से बाहर जा रहे हैं, वापस लपककर घर जा रहे हैं। डर न लगे इसलिये कुछ लोग अपने साथ डंडा थामे हुये हैं। वातावरण की सारी आक्सीजन लोग अपने पेट में जमा करके घर ले जा रहे हैं। कार्बन डाई आक्साइड को जहां तहां छितराते हुये चल रहे हैं।

कोने में कुछ रिटायर्ड बुजुर्गवार पता नहीं किसपर ठहाका लगा रहे हैं। जिंदगी जिनकी रोते हुये बीती वे भी अट्टहास कर रहे हैं। जो घर से रुआंसी सूरत लेकर आये हैं और वैसी ही वापस ले जायेंगे वे भी खिलखिला रहे हैं। यह संगत का ही असर है। आचार्य रामचंद्र शुकुल जी (ये सीनियर ब्लागर नहीं थे हिंदी साहित्य का इतिहास के लेखक थे)कहिन हैं- कुसंग का ज्वर भयानक होता है लेकिन इस सत्संग के ज्वर के बारे में कुछ नहीं बताइन उई तो हम काहे पचड़े में पड़ें।

हम बढ़े चले जा रहे थे सड़क पर। मन में कविता गुनगुना रहे थे:-

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर हटो नहीं
तुम निडर डटो वहीं।

 

हम बढ़े तो चले ही जा रहे थे। धीरज भी धारण किये थे। एक ‘स्पीड ब्रेकर’ को पहाड़ समझकर पार किया और सीना फुला लिया। लेकिन कहीं सिंह की दहाड़ नहीं मिल रही थी। पहले तो सोचा कि पास में रहने वाले मित्र समर पाल सिंह के यहां चले जायें और कविता का चित्रांकन पूरा करें लेकिन यह सोचकर कि घर में तो सिंह बाबू दहाड़ते नहीं मिमियाते हैं, हमने अपना इरादा त्याग दिया। त्याग का फल तुरंत मिला। सामने से एक टैंपो धड़धड़ाता, धुआं उगलता हुआ निकल गया। टेम्पो आधुनिक सड़क सिंह हैं। जिस तरह किसी जंगल में ग्घूमते हुये शेर किसी भी रास्ते आकर आपको चौंका सकता है, सिट्टी-पिट्टी गुम कर सकता है वैसे ही टेम्पो किसी भी सड़क अचानक आपके सामने प्रकट होकर आपको चिहुंका सकता है। टेम्पो का टेम्पो हर सड़क पर हाई रहता है। ये घरघराते हुये जिस रास्ते निकल जाते हैं वहां भीड़ काई की तरह फट जाती है। कविता का चित्रांकन पूरा करते ही हम याहू कहते हुये उछलने ही वाले थे कि यह सोचकर रुक गये कि कोई हमें जंगली न कह दे। सनीमा और शम्मी कपूर की बात अलग है लेकिन शहर में जंगली की वही दशा होता है जो कन्याऒं में मंगली की होती है-लोग कटते हैं।

बहरहाल हम कविता की अंतिम पंक्ति के अनुसार एक जगह खड़े हो गये, डट गये। मुझे अपने पैरों के पास सरसराहट सी हुयी और हम ‘नो टामी नो’, नो टामी कहने ही वाले थे कि याद आया कि टामी तो सामने वाले शर्माजी के कुत्ते का नाम है और नो टामी नो तो श्रीमती शर्मा का तकिया कलाम है जिसे वे अक्सर तब बोलती हैं जब उनका प्यारा टामी हमारे बगीचे में पर्याप्त उछलकूद करने के बाद वहां खिले फूलों को क्यारियों समेत रौंद चुका होता है।(एक डायलाग का स्कोप है— रौंदने वाला रौंदते समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता ) तो क्या हम अकेलेपन का फायदा उठाकर श्रीमती शर्मा को याद करने इस वीरान सड़क पर आये हैं। तो क्या पैरों के पास की सरसराहट का यही कारण है? क्या इसके बाद चिनचिनाहट भी होगी?

लेकिन जल्दी ही हमें श्रीमती शर्मा की याद का साथ त्यागना पड़ा। पाया कि हमारे पैरों से एक पालीथीन सटी हुयी थी। हमें लगा कि क्या ये कोई कलयुगी अहिल्याजी है क्या जो हमारे चरणों के प्रताप से अपना उद्धार कराने के लिये सटी हैं। हम सोच ही रहे थे कि पालीथीन हवा के सहयोग से सीटी से बजाती हुयी बोली- मैं पालीथीन हूं।

मुझे पालीथीन की आवाज की नजाकत के बावजूद महाभारत सीरियल का गंभीर आवाज में बोला गया डायलाग याद आ गया- मैं समय हूं।

मैंने कहा वो तो मैं देख रहा हूं। घर-घर वासी, गली-निवासी, नाली-प्रवासी, मैदान-विलासी पालीथीन की महिमा से कौन अभागा परिचित नहीं है? दसो दिशाऒं में आपकी पताका फहरा रही है। मैदान की सारी घास के ऊपर आपका उसी तरह से कब्जा है जैसे पूरे देश को जड़ता और भ्रष्टाचार ने अपने चंगुल में कर रखा है। बतायें देवी मैं आपके लिये क्या कर सकता हूं?
पालीथीन थोड़ी चिकनी, ‘ग्रेसफुल’ टाइप की लग रही थी सो हमने अपने सवाल को अंग्रेजिया भी दिया -व्हाट कैन आई डू फ़ार यू?(प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने के पहले कहा तो मैंने माई डीयर पालीथीन भी था लेकिन तमाम ऊंच-नीच और अनुवाद की शुद्धता का विचार करते हुये आपको बता नहीं पा रहे हैं, शरमा से रहे हैं)।

पालीथीन ने थोड़ा इठलाते हुये और बहुत सारा लहराते हुये कहा- आप मेरे बारे में कुछ लिखिये न!

मैंने कहा- क्या लिखूं?

वो बोली- जैसे समीर लाल जी ने लिखा। झोले जी के बारे में।

हमने चौंके- आपको कैसे पता कि समीरजी ने झोले के बारे में लिखा? क्या आप भी ब्लागर हैं? और तरकश नियमित पढ़ती हैं?

पालीथीन हवा के सहारे दायें-बायें हिलती हुयी बोली -नहीं, नहीं। मैं ऐसी वैसी नहीं हूं। भले घर की पालीथीन हूं। हमारी भी कोई इज्जत है हम क्यों करेंगी ऐसा कोई काम जिससे हमारे बारे में किसी को कुछ कहने का मौका मिले। हम ब्लाग-फ्लाग के चक्कर में नहीं पड़ते।

हमने पूछा- फिर तुमको झोले वाले लेख के बारे में कैसे पता?

वो बोली -ऐसे ही। हम लोगों का खानदान एक ही है न! वो झोला जी हमारे पूर्वज हैं न! दादा, परदादा टाइप का रिलेशनशिप है हमारा। वे भी सामान रखने के काम आते थे मैं भी सामान रखने के काम आती हूं। हमारे और उनकी पीढ़ी में मुख्य अंतर यह है कि वो पूरे घर से जुड़े थे मैं केवल सामान से जुड़ी होती हूं। वे घर का ‘स्टेटस‘ बताते थे जबकि मैं सामान की औकात बताती हूं। वे घर से बाजार और फिर वापस घर आते-जाते रहते थे जबकि मैं आमतौर पर सिर्फ दुकान से घर की ड्यूटी बजा कर फ्री हो जाती हूं।

मैंने पूछा - तो क्या उन्होंने बताया तुमको मेरा मतलब आपको उस लेख के बारे में?

वह इठलाते हुई बोली- आप मुझे आप मत बोलिये। मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है मैं बहुत बड़ी हो गयी हो गयी हूं। आप मुझ तुम ही कहिये। मुझे अच्छा लगेगा।

मैंने कहा- अच्छा,अच्छा ये बताऒ तुमको कैसे पता चला समीरजी के लेख के बारे में?

वह बोली- वैसे तो मैं कह सकती हूं कि जाऒ नहीं बताती आपको लेकिन बेकार समय बरबाद होगा यह सोचकर बता देती हूं क्योंकि आप पूछे बिना मानेंगे नहीं और मुझे बताये बिना चैन नहीं पड़ेगा। मैं पिछ्ले हफ्ते एक किताब को अपने में लपेटकर लायी थी इस सामने वाले घर में। पता नहीं कैसे हैं ये लोग! किताब लाकर मुझको उसके साथ मेज पर पटक दिया। मैं पूरे हफ्ते भर पड़ी रही मेज पर किताब को अपने अंदर समेटे। मुझे लग रहा था कि ये अपनी किताब निकाले और मुझे भेजे कूड़ेदान में जहां मैं दूसरी पालीथीन के साथ मजे करूं। बतियाऊं, गंदगी समेटूं, उड़ाऊं। लेकिन मुझे लगता है कि वो किताब को अपने कामधाम की तरह भूल गया था और उसने उसे नहीं खोला तो नहीं ही खोला।

हमने थोड़ा झुंझलाते हुये कहा- तुम जल्दी बताऒ। कहानी मत सुनाऒ फ़ुरसतिया की तरह।

वह बोली- तो उसी मेज पर पड़े-पड़े मैं ऊब गयी। एक दिन देखा कि घर वाला आकर बैठा और मेज पर पड़ा कम्प्यूटर खोलकर न जाने क्या पढ़कर हंसने लगा। मैंने सोचा कि शायद वह मेंटल है। लेकिन बाद में जब उसने अपनी पत्नी को भी पढ़ाया/सुनाया और दोनों हंसने लगे तब मुझे लगा कि ऐसा नहीं है। उसी दिन से लगा कि काश कोई मेरी भी कहानी लिखता। इसी तमन्ना में मैं बाबरी घूम रही हूं।

मैंने कहा- ये कैसी अजीब तमन्ना है तुम्हारी?

लगता है वह पालीथीन कुछ ज्यादा ही ब्लाग पढ़ चुकी थी। वह बोली- ये वैसी ही तमन्ना है जैसी जीतेंदर जी की है कि कोई उनका कच्चा चिट्ठा लिखे । एक बार लिखे - बार-बार लिखे।

हमें लगा कि यह तो अंदर की बातें जानती है सो टालने के लिहाज से बोले- तुम समीरजी से कहो न! वे ही बढि़या सा लिखेंगे तुम्हारे बारे में।

वो बोली - अब हम कनाडा जाने का पैसा कहां से लायें? और कौन ले जायेगा मुझे वहां? वहां तो इतनी गंदगी भी नहीं जहां आराम से रह सकूं। अकेलेपन से मुझे बहुत डर लगता है।

अच्छा मैं लिखने की कोशिश करूंगा। लेकिन तब जबकि समीरजी एक कुंडलिया लिखेंगे इस पर और राकेश खंडेलवालजी चार लाइन की कविता।

आप भी एकदम मिडिलची बुद्धिजीवियों की तरह बात करते हैं जो कि यह चाहते हैं कि पहले देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये, भाई-भतीजा वाद खत्म हो जाये, सारी स्थितियां सुधर जायें तब वे देश सेवा के काम में जुटें। देश के लिये कुछ करने की सोचें। अरे समीरजी को, राकेशजी को जो लिखना होगा वो तो लिखेंगे ही। आप अपना काम करिये न! लिखिये न कुछ मेरे बारे में।

मैंने पूछा- मानो मैंने लिखा भी तो तुम्हें कैसे पता चलेगा?

वह बोली- चल जायेगा उसकी आप चिंता न करें।
हमने कहा- कैसे बताऒ तो भला!
पालीथीन ने बताया- जो आप लिखेंगे वह उसका प्रिंट आउट लेंगे। फिर किसी दूसरे को दिखाने के लिये फोटोकापी करायेंगे। जो भी करायेंगे अंतत: आयेगा वह नाली में ही, जुड़ेगा वह कूड़े से ही। और जहां कोई चीज कूड़े या नाली से जुड़ी तो वह हम तक पहुंच ही जायेगी।

हमने कहा- अच्छा ठीक है। मैं कोशिश करूंगा। फिलहाल तो मैं चलता हूं आफिस की देर हो रही है। तुम क्या करोगी?
पालीथीन ने बताया-कुछ नहीं। बस कुछ देर इधर-उधर उड़ती फिरूंगी। मन किया त्तो थोड़ा कीचड़ में नहाउंगी सामने की नाली में। तब तक हो सकता है कि सामने वाले घर से कुछ और पालीथीन सहेलियां आ गिरें। वो रोज फेंकती हैं न ऊपर से सबेरे अपने घर का कूड़ा मय पालीथीन नीचे। अगर उसमें कुछ पालीथीन सहेलियां आईं तो उनसे गलबहियां करके बतियाउंगी और फिर आगे जैसा होगा वैसा तय करूंगी।

हम घर लौट आये। हमें मुस्काते देख पत्नी ने गुनगुनाया-


तुम इतना क्यों मुस्करा रहे हो!
क्या गम है जो मुझसे छिपा रहे हो?

हम कुछ जवाब न देकर नहाने के लिये बाथरूम में घुस गये।

नल के पानी के साथ-साथ मेरे कान में सड़क पर मिली पालीथीन के शब्द गूंज रहे थे- मेरे बारे में लिखना जरूर! मजाक नहीं, सीरियसली।

हम कुछ तय नहीं कर पाये अत: गाने लगे:-

ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिये,
गाना आये या न आये गाना चाहिये।

 

मेरी पंसद - मुकुट बिहारी सरोज की यह पंक्तिया

भीड़-भाड़ में चलना क्या?
कुछ हटके-हटके चलो

 

वह भी क्या प्रस्थान कि जिसकी अपनी जगह न हो
हो न ज़रूरत, बेहद जिसकी, कोई वजह न हो,
एक-दूसरे को धकेलते, चले भीड़ में से-
बेहतर था, वे लोग निकलते नहीं नीड़ में से

दूर चलो तो चलो
भले कुछ भटके-भटके चलो

तुमको क्या लेना-देना ऐसे जनमत से है
खतरा जिसको रोज, स्वयं के ही बहुमत से है
जिसके पांव पराये हैं जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं

भले नहीं सुविधा से -
चाहे, अटके-अटके चलो

जिनका अपने संचालन में अपना हाथ न हो
जनम-जनम रह जायें अकेले, उनका साथ न हो
समुदायों में झुण्डों में, जो लोग नहीं घूमे
मैंने ऐसा सुना है कि उनके पांव गये चूमे

समय, संजोए नहीं आंख में,
खटके, खटके चलो.

साभार : http://hindini.com/fursatiya/?p=204

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