Home | व्यंग्य | चाय चलेगी क्या ?
Newsletter
Email:

चाय चलेगी क्या ?

Font size: Decrease font Enlarge font
image

अगर आपको किसी तरह की कोई खास बीमारी न हो, किसी तरह की कोई कसम आपने न खा रखी हो और आपके चिकित्सक ने अलग से आपको मना नहीं किया हो तो कोई अगर आपसे यह पूछे कि चाय चलेगी? तो भले ही आपका जवाब ना में हो, उस वक्त आपके चेहरे की चमक से सामने वाले को यह अंदाजा हो ही जाता है कि चाय की ज़रूरत आपको कितनी है. चाय तो चाय है. अगर आप दारू-शारू नहीं पीते हैं और चलो साथ में चाय भी नहीं पीते हैं, तब भी आप कहलाते हैं- टी-टोटलर. यानी चाय आपके साथ है, भले ही आप चाय के साथ नहीं हैं.

सुबह उठते ही चाय, फिर अख़बार के आ जाने के बाद ख़बरों के साथ चाय, फिर सुबह के नाश्ते के साथ चाय, फिर दफ्तर या दुकान पहुंचने पर काम की शुरूआत के लिए चाय, दोपहर की अतिआवश्यक चाय, दोपहर के भोजन के बाद जरूरी चाय, शाम की चाय और इस बीच टपक पड़े मेहमानों के स्वागत सत्कार के लिए चाय. यानी अपने जीवन के एक बड़े हिस्से की एक बड़ी जरूरत है चाय और सिर्फ चाय.

चाय आज के वक्त का जीवन जल है. जरा याद कीजिए जब पिछली मर्तबा आप किसी काम से किसी कार्यालय में पधारे थे तो दफ्तर के भीतर और दफ्तर के बाहर चाय की दुकान का नजारा कैसा था?

जहाँ दफ्तर एक ओर नीरव, निर्जीव, प्राणहीन और बोरियत से परिपूर्ण नजर आया था, वहीं दफ्तर के पास वाली चाय की दुकान जीवनी शक्ति से परिपूर्ण, सजीव, प्राणवान, ऊर्जावान और रंगीनियत से भरी नजर आई थी. आखिर क्यों? सिर्फ इसलिए कि चाय में वह ताकत है जो प्राणहीन चीजों में भी प्राण वायु का संचार कर दे. यही कारण है कि दफ्तरों में फ़ाइलों के बोझ से मृतप्राय: बाबुओं का मन चाय की दुकान पर आकर हर्षोल्लास से जीवित हो उठता है. जरा यह भी याद कीजिए कि किसी दफ्तर के किसी बाबू की उबासियाँ कैसे छूमंतर हो गई थीं जब आपने उसे चाय के लिए आमंत्रित किया था.

चाय का चक्कर अजीब है. चाय पिला कर जहाँ एक ओर आप सामने वाले से अपनी आत्मीयता प्रकट कर सकते हैं, तो घूस रूपी सिर्फ एक कप चाय से आप अपना कोई बड़ा काम भी करवा सकते हैं. नमक का कर्ज अदा करने की बात पुरानी हो चुकी है. अब तो चाय का कर्ज चढ़ता और उतरता है. आपसे कई दफा लोगों ने अपनी सेवाओं के बदले चाय-पानी का खर्चा चाहा होगा. कभी आपका आत्मीय आपको चाय के लिए पूछना भूल गया होगा तो भले ही आप चाय नहीं पीते हों, आपका चाय पीने का मूड उस वक्त बिलकुल न रहा हो, फिर भी आप कहेंगे साले ने चाय के लिए भी नहीं पूछा.

समय के हिसाब से चाय के अपने मजे हैं. सुबह की चाय का अपरिमित, अतीव, असीम आनन्द अवर्णनीय और अकल्पनीय तो है ही, किसी खोमचे वाले की चाय का फुर्सत में बैठ कर पीने का अपना आनन्द है. चौक पर सड़क पर खड़े रह कर फालतू की चर्चा में चाय पान का अलग आनन्द है. अखबारों में सिर घुसाकर सुड़की गई चाय का अलग आनन्द है, तो बीवी और टीवी के साथ टी के आनन्द की बात ही क्या है. चाय चाहे मीठी हो या कड़वी, काली हो या ख़ालिस दूध की, अपने हिसाब से सबको अच्छी लगती है, खासकर तब जब इसकी तलब तेज लगती है. इसीलिए तो ट्रेनों में बिकने वाली सफेदा की चाय भी भाई लोग उसमें मजा ढूंढकर पी ही लेते हैं. दरअसल चाय तो हमेशा अच्छी ही होती है, बस कभी वह थोड़ी अच्छी, ज्यादा अच्छी या कभी सबसे अच्छी हो जाती है.

और अगर आप चाय के विज्ञापनों पर भरोसा करें तो चाय के बड़े-अच्छे फ़ायदे भी हैं. किसी ब्रांड विशेष की चाय पीकर आदमी कड़क दिल वाला जवान हो जाता है जिसकी मूँछों की ताव से ही शेर डर के मारे भाग जाता है तो कोई और ब्रांड की चाय की खुशबू से आदमी मृत्युशैय्या से वापस आ जाता है. कोई खास ब्रांड की चाय पीकर वाह! बोल उठता है, तो कोई उसकी खुशबू मीलों दूर से सूँघ कर खिंचा चला आता है. हो सकता है चाय के आपके अनुभव भी ऐसे ही रोमांचकारी हों. मेरा अपना अनुभव है कि सुबह का प्रेशर चाय के बगैर बनता ही नहीं. अकसर लोग सुबह उठने के लिए चाय पीते हैं पर कई ऐसे भी हैं जो चाय का एक प्याला हलक में उतार कर सोने जाते हैं.

चाय की इतनी चर्चा करने के बाद तो भाई, अब तो चाय चलेगी?

Comments (1 posted):

अनुज माथुर on 16 April, 2007 11:20:05
avatar
अंग्रेज़ी ब्लौग के दौर में इस प्रकार की व्यंगात्मक लेख अत्यंत ही सराहनीय हैं। मैं आपकी लेखन शैली से काफी प्रभावित हुआ।

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

  • email Email to a friend
  • print Print version
  • Plain text Plain text
Tags
No tags for this article
Rate this article
3.67