कंबल
दिसम्बर का महीना, कड़ाके की सर्दी, और फुटपाथ पर रहने वालों का दर्द। सब कुछ मानों एक-दूसरे से जुड़ा हुआ आता है, कलैण्डर में। हर साल की तरह आती हैं सर्दियाँ और हर बार हमें अपना कद चादर से बड़ा होने की पीड़ा महसूस होने लगती है। घुटनों को कलेजे से लगाकर खुद को चादर में समेटे पड़े रहना और राम-राम करके उजाला हो जाने की आस करना कैसा पीड़ादायक होता है? कोई हमसे पूछे। तिस पर आए दिन पुलिस के डण्डे और मवालियों की वसूली। दो वक्त पेट में कुछ डालने भर को कुछ नहीं बचता पास में। भीख माँगना, जूता पॉलिश करना या पॉलीथीन बीनते फिरना। ये दो तीन ही रोजगार हम लोगों की नियति हैं। भीख माँगने को आसान समझने वाले पॉलीथीन बीनना नहीं स्वीकारते और पॉलीथीन झडका-झडका के उठाने वाले, भीख माँग कर जलील नहीं होना चाहते। बहरहाल मैं ना भीख माँगता हूँ, ना पॉलीथीन बीनता हूँ, मैं अपनी पोर्टेबल सन्दूकची उठाकर घूमता हूँ, बूट-पॉलिश करने को। सबके अपने-अपने तर्क हैं, सबकी अपनी-अपनी पसंद। लेकिन एक बात जो सबमें एक-सी है, वो है कृ जाड़े की रातों में कहर को झेलना, नंगे बदन।
फुटपाथ के जिस टुकड़े पर मेरा आधिपत्य है, उसी के बगल में राधे रहता है और अगल में भीखू। राधे अकेला है, भीखू के बाल-बच्चे हैं। भीखू की घरवाली और दो बच्चे पॉलीथीन बीनते हैं और भीखू भीख माँगता है। भीखू की औरत मैलेकुचैले कपड़ों में जैसे-तैसे अपने नारीत्व को ढके रखने की कोशिश करती है। पर बच्चे अधनंगे ही रहने को मजबूर हैं। जाड़े की रात को एक फटे से कंबल में चार जने एक-दूसरे में जकड़ कर जैसे तैसे काटते हैं। राधे और मैं दोनों ही बूट पॉलिश करते हैं। कभी-कभी अच्छी ग्राहकी हो जाती है तो रात को एक-एक थैली भी पी लेते हैं। उस रात, ठण्ड थोड़ी कम लगती है। पर एसी रातें महीने में एकाध ही होती हैं। वरना, ज्यादातर तो खाने के ही लाले पड़े होते हैं और भूखे पेट रात भर कुकुड़-कुकुड़ करते रहना पड़ता है।
एक दिन सुबह-सुबह देखा नगरपालिका के सफाई कर्मचारी हाथ में बड़े-बड़े झाडू लेकर हमारी ओर बढ़े आ रहे हैं। साथ में दो तीन पुलिसिए भी थे। हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही उनमें से एक मुच्छड़-से आदमी ने जोर से हाँक लगाई, 'ए! हटो यहाँ से ... उठाओ अपने टीन-टप्पर ...-' मुच्छड आदमी शायद दारोगा था।
लोग अपना-अपना सामान सट्टा समेटने लगे। अचानक वहाँ भगदड़-सी मच गई। अफरा-तफरी में लोग अपना सामान लेकर इधर-उधर तितर-बितर होने लगे। किसी ने भी ये नहीं पूछा कि 'क्यों?' झाडूवाले जोर-जोर से झाडुएँ फटकारने लगे और फुटपाथ पर धूल के गुबार उठने लगे। फुटपाथ पर रहने वाले कुछ लोग तो भाग गए। मगर ज्यादातर ने गोर्मेण्ट हॉस्टल के पिछवाड़े वाली दीवार के सहारे-सहारे अपना सामान टिका दिया और झुण्ड में बैठ कर फुटपाथ की सफाई का नजारा देखने लगे।
श्रवण बोला, 'साले, सुबह पैले आ गए, इनकी माँ की ... '
'जरूर कोई लीडर-शीडर आ रहा होगा, आज।' राधे ने जोड़ा।
'लीडर यहाँ फुटपाथ पर क्या मराने आएगा, ठण्ड में?' मैंने चाय का कुल्लड़ एक ओर लुढ़काते हुए पुकारा। सब जोर से हँस पड़े। ठहाका सुनकर एकबार तो सफाई कर्मचारियों ने झाडू रोक कर हमारी ओर देखा और हमें खीसें निपोरते देख फिर झाडू फटकारने लगे। हम फिर एकबार जोर से ठहाका लगा उठे।
'यार, गोपी एक बात बता। ये सुसरे सफाई करन लाग रहे। कंबल-कुंबल क्यों ना बंटवाते मादरजात? जाड़े में ... ऐसी-तैसी हुई पड़ी हम सबन की' देवा ने मुझसे पूछा।
'देख भई देवा, ये लीड़र साले दिन में गुजरते हैं इन रास्तों से। रात में साले लगे पड़े होते हैं, रजाइयों में। रात में कभी आएँ साले, तो पता चले। हलक में साँस ना जम जाए तो कहना।'
'सुनो-सुनो ... गोपी चाचा ... सुनो तो।' भीखू का लड़का हाँफता हुआ आया। बटन टूटी कमीज, बगैर चड्डी-हाफपैण्ट के वो अजीब सा लग रहा था। उसके हाथ, पैर, मुँह, घुटने पर मैल की मोटी परत चढ़ी थी। लड़का चूँकि सुबह की तेज हवाओं में दौड़ कर आया था। सो उसकी ऑंख और नाक दोनों अनवरत बह रहे थे। उसने कमीज की बाँह से ऑंख, नाक एक साथ पौंछे और बताने लगा, 'चाचा, सुना है आज मंत्री जी आएंगे, इहाँ रैन-बसेरा का उद्धाटन करने ...। '
' रैन-बसेरा का हुई है भाई? ' देवा समझ नहीं पाया।
'रैन-बसेरा माने रात का ठिकाना। दो-चार रुपये लेकर वहाँ रात बिताने दी जाएगी गरीबों को।' मैंने समझाया।
'... और कंबल भी बाँटेंगे मंत्री जी ... ' लड़के की आवाज में उल्लास था। पास ही बैठी भीखू की घरवाली अपने छोरे को चपर-चपर बोलता देखके निहाल हुई जा रही थी। 'कैसी बढ़िया खबर लेकर आया है, छोरा? कहो, किसी और को पता थी ये बात?' उसने पास बैठी सन्तों से कहा।
'कौन कह रहा है, ये सब?' मैंने लड़के से पूछा।
'ऊहाँ वो मुच्छड़ दारोगा है ना, वो ही बता रहा था, किसी को। मैंने सुन ली।' लड़का सगर्व अपनी उपलब्धि बताने लगा।
'पर ई बताओ गोपी भैया, ई ससुर रात सोबे खातिर दुई-चार रुपया आई कहाँ से? दुई चार-रुपया तो दिर भर की कमाई होय। ऊ भी दे दइबे तो खाइबे का? ऊ दरोगा का सिर। ... कहो तो' घनसी काका ने पूछा।
'काका, ये सब तो पालटिक्स है इन ससुर लीडरन की। कहबे को रैन बसेरा, धरम का काम और हुइबे को कमाई का धन्धा। अरे! गरीब जोन दुई-चार रुपया ही दे सकता तो रैन-बसेरा ही मैं क्यो सोने आता भला।' मैंने भी काका की बात का ही समर्थन किया।
'ई से बढ़िया तो, ई हुई जाए कि कंबल दे दियो हमें, सो लईहें हम फुटपाथ पर ही।' भीखू ने सुझाव दिया, पास बैठे लोगों ने हामी भर दी।
देखते ही देखते सड़क के किनारे-किनारे कनात लग गई। अस्थाई टैण्ट लग गया। दो बाई तीन के लट्ठे पर 'रैन-बसेरा' लिखकर टाँग दिया गया। धीरे-धीरे धुंध छँटने लगी थी और सूरज देवता का परसाद बिखरने लगा था। गाड़ी मोटरों की चिल्लपौं बढ़ने लगी थी और लोगों की आवा-जाही शुरू हो गई थी। हम सब अपने-अपने धन्धे पर निकलने लगे थे। भीखू, देवा, घनसी काका आदि भीख माँगने, श्रवण, राधे और मैं बूट पालिश करने, बाकी लोग पॉलीथीन बीनने निकल पड़े थे। भीखू की औरत और बच्चे भी पीठ पर मैलाकुचैला बोरा लटकाये अपनी दिनचर्या के लिए निकल पड़े थे। सब लोग अपनी-अपनी जल्दी में थे। मैं भी निकल गया।
दिनभर की अपनी नौकरी करके शाम को जब हम लौटे तो अपने ही फुटपाथ को पहचान नहीं पाये। सड़क पर टैण्ट हाऊस की कुर्सियाँ सजी थी। एक तरफ से रास्ता बंद कर दिया गया था। माईक लगा था। कुछ संभ्रान्त से लोग वहाँ बैठे थे। कुछ ही देर में मंत्री जी आने वाले थे। रैन-बसेरा वाले तम्बू के दरवाजे पर एक लाल रिबन बाँधा गया था। देश में अब रैन बसेरों का उद्धाटन भी फीता काटकर होने लगा है। देश की प्रगति देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था। दूर, दीवार के सहारे हम लोगों की गिरस्ती पड़ी थी। हम लोग अपने-अपने सामान के पास जा बैठे। सभी को आज उम्मीद थी कि आज हमें जरूर कंबल मिलेंगे और रात को चैन से भी सो सकेंगे। शायद, इसी आस में आज हम लोग और दिनों की बजाय कुछ जल्दी लौट आए थे। बच्चों के चेहरे आज खिले हुए थे, औरतों के चेहरे पर मुस्कान थी और बूढी ऑंखों में चमक झूल रही थी।
तभी एक टैक्टर ट्राली आकर ऐन तम्बू के सामने रुकी और उसमें से कई सारे मैले कुचैले, आदमी, औरत, बच्चे, बूढे उतारे गये। सब के सब लाईन लगा कर बैठ गये। सब कुछ जैसे पूर्वनियोजित एवं साठ-गाँठ से हुआ जान पड़ता था। 'ना जाने कहाँ से आ गए ये लोग?' हम सबकी ऑंखों में एक ही प्रश्न था। दरोगा, एक-एक के पास जाकर कुछ पूछ रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था। उसके चेहरे पर अलग-सा कुटिल रौब था। अचानक उसने नजर उठाकर हमारी ओर देखा और बुलाने का ईशारा किया। एक साथ कई सारे लोग लपके। वो जोर से दहाड़ा, 'अबे तू आ ... तू ... सारे नहीं।' उसका ईशारा भीखू की तरफ था। सभी की नजरें भीखू की ओर उठी। वो खुद भी इधर-उधर देखने लगा। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब दरोगा फिर चिल्लाया, 'हाँ-हाँ ... तू ही। इधर-उधर क्या ताकता है? इधर आ ...-' भीखू सहमा-सहमा उठा और दरोगा के पास जा पहुँचा, 'हुजूर?'
'हुजूर के बच्चे, कंबल चाहिए कि नहीं?'
'चाहिए हुजूर' भीखू तपाक से बोल पड़ा। उसकी ऑंखों में कुछ चमकने लगा।
'तो चल लाईन में बैठ, जा।' दरोगा ने डपटते हुए कहा। भीखू चुप लगाकर लाईन में बैठ गया। हम लोगों के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भीखू बीच-बीच में मुड़-मुड़ कर हमारी ओर देख लेता था। उसके चेहरे पर गर्व के-से भाव थे। इतने सारे गरीबों में से भाग्यशाली गरीब चुन लिया जाना, गर्व ही की तो बात थी।
मंत्री जी आए, तम्बू का फीता काटा, कंबल बाँटे, फोटो खिंचवाये, भाषण झाड़ा, चले गये। टैक्टर आया, कुर्सियाँ उठाई, धूल उड़ाई, चला गया। बाहर से लाकर खडे कर दिये गये गरीबों से 'किसी' ने कम्बल वापस ले लिए, दस बीस रुपये दे दिये और उन्हें भगा दिया। कुछेक अपने मैले कुचैले चादरों और फटे-पुराने कम्बलों के साथ रैन-बसेरे में सोने को रुक गये। बाकी चले गये। लेकिन कुछ लोगों के पास अब भी नये कंबल नजर आ रहे थे। वो लोग कम्बल लेकर इस तरह इतराते फिर रहे थे मानो वी.आई.पी. हों। शायद कोई विशेष बात थी। बड़ा रहस्य था। उनमें हमारा भीखू भी एक था।
भीखू, हमें अपना कंबल उलट-पलट कर दिखा रहा था। सब लोग हसरत भरी नजरों से उसके कंबल को देख रहे थे। कोई छू कर देखता, कोई ओढ़ कर। भीखू के बच्चे मानो आज खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। कंबल की तह लगाकर दोनों बच्चे उसके पास बैठ गये थे। मानो किसी खजाने की चौकीदारी कर रहे हों। भीखू खुश था। कोई पूछता, 'भीखू तेरी पहचान है क्या, दरोगा से?' कोई कहता, 'तू तो बड़ा भागी निकला रे भीखू।' कोई कहता, 'चल अबके जाड़े तो चैन से निकल जायेंगे, तेरे।' कई तरह के लोग, कई तरह के सवाल, कई तरह की बातें। सबके जवाब में भीखू बस मुस्कुरा रहा था और सिर हिला हिलाकर बस गर्वित हुआ जा रहा था।
... रात गहराने लगी थी, सब फुटपाथिए अपने-अपने चीथड़ों में दुबके पूर्ववत् सड़क किनारे के फुटपाथ की शोभा बढ़ाने के लिए अपनी-अपनी जगह पर आ जमे थे। मैं बैठा अभी बीड़ी ही सुड़क रहा था कि भीखू का छोरा दौड़ा-दौड़ा आया, 'चाचा, चाचा ... माई को देखा क्या तुमने?'
'नहीं तो ... ' मैंने अनभिज्ञता जताई। रात के लगभग दस बज रहे थे। कहाँ गई होगी इस समय? रह-रह कर विचार आ रहा था।
कुछ ही क्षणों बाद भीखू बदहवास सा दौड़ता हुआ आया। 'औरत को देखा क्या?' उसकी ऑंखें पूछ रही थी। मैंने ऑंखों ही ऑंखों में मना कर दिया। भीखू के कंधे पर अभी भी 'वो' नया कंबल लटक रहा था। बड़े ही जतन से भीखू ने उसे सम्हाल रखा था और रह-रह कर उसे कंधे पर सहेज रहा था। वो भी जरा इधर-उधर देखकर लौट गया।
रात के लगभग पौने दो बजे होंगे अभी। मैं उनींदा-सा अपनी फटी लोई में खुद को दुबकाए पड़ा था। तभी, मैंने देखा दूर अंधेरे में सड़क की दूसरी ओर एक टैम्पो रिक्शा रुका और उसमें से भीखू की औरत उतरी। उतर कर वो जरा देर टैम्पो के पास ही खड़ी रही। टैम्पो के भीतर शायद कोई बैठा था, उसने औरत के हाथ में कुछ दिया और शायद हाथ को दबाया भी। औरत ने झट-से अपनी लूगड़ी के पल्लू में कुछ बाँध लिया था। टैम्पो चल दिया। मेरी नजर टैम्पो ही में लगी थी, जैसे ही टैम्पो दाहिने हाथ को मुड़ा, मैंने देखा टैम्पो की पिछली सीट पर सुबह वाला मुच्छड़ दारोगा बैठा था, पसर कर।
मैंने देखा भीखू अपनी औरत से हवा में हाथ हिला-हिलाकर तेज-तेज बातें कर रहा है। वो, उसको कुछ समझा रही है। धीरे-धीरे भीखू का पारा गिर रहा है। औरत ने पल्लू में बँधी गाँठ खोलकर भीखू के हाथ में कुछ रख दिया। वो अब खुश नजर आ रहा था। दोनों हँसी-खुशी रैन बसेरे में चले गये।
दूसरे दिन, सुबह। मैंने भीखू से पूछा, 'अरे! औरत मिल गई थी क्या?'
'हाँ ' , भीखू ने चहक कर जवाब दिया था।
'किधर हो ली थी?' मेरा दूसरा प्रश्न।
'कहीं ना, उसको कल किसी ब्याह की लाईट हाँडे उठाने का काम मिल गया था। बीस रुपये लेकर आई है।' वो खुश था।
मैं निरुत्तर। ... टैम्पों की पिछली सीट पर मुच्छड़ दारोगा क्या कर रहा था?
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