डिजिटल फ़िल्म और भारत
मेरे मित्र दिनेश कपूर ने अभी हाल में गोविन्दा के भांजे कृष्णा को लेकर एक प्यारी सी फ़िल्म प्यार के रंग हजार बनाई है और वो दूसरी फ़िल्म की तैयारी कर रहे हैं. यूहीं चर्चा के दौरान उन्होंने मुझसे एक सवाल दागा कि हमारी फ़िल्में जब डिजिटल फ़ार्म में रिलीज होतीं है तो डिजिटल शूट क्यों नहीं होती ?
यह एक यक्ष प्रश्न है.
हिन्दुस्तान में अभी तक कुछ गिनती की ही डिजिटल फ़िल्में बनकर रिलीज हुई हैं. इनमें राम माधवानी की लेट्स टाक, कमल हासन की मुम्बई एक्सप्रेस शामिल है. कुछ फ़िल्में दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी बनी हैं. फ़िल्म वालों में ज्यादातर का यह मानना है कि आने वाला समय डिजिटल फ़िल्मों का ही है पर शुरूआत करने को कोई तैयार नहीं है.
लगभग चार पांच साल पहले डीएलएफ़ की पिया सिंह ने डिजिटल टाकीज के नाम से दिल्ली में एक मूवमेन्ट चलाया था. तब शेखर कपूर, नसीरुद्दीन शाह आदि भी डिजिटल टाकीज के लिये फ़िल्में बनाने वाले थे पर बाद में सब कुछ टांय टांय फ़िस्स हो गया. पियासिंह ने डिजिटल टाकीज की पुण्य स्मृति में अपने मल्टीप्लेक्स का नाम DT रख दिया. डिजिटल फ़िल्म का मूवमेन्ट वहीं का वहीं है. (कुछ गलती इन डिजिटल फ़िल्म बनाने वालों की भी थी कि भरपूर खर्च के बाबजूद कैमरे उन्होनें प्रोयूजर ही लिये.)
डिजिटल फ़िल्मों को खरीददार नहीं मिल रहे हैं
थोडी सी डिजिटल फ़िल्में बन कर पडी हुई हैं पर इन्हें खरीदार नहीं मिल रहे हैं. लोगों के मन में डर है. कुछ हल्ला फ़िल्म का कच्चा माल बनाने वाली बडी कम्पनियों ने मचाया हुआ है. अगर डिजिटल फ़िल्में बनना शुरू हुईं तो उनके कच्चे माल की बिक्री एकदम खत्म हो जायेगी. इन मल्टीनेशनल कम्पनियों के प्रचार से लडना बहुत मुश्किल है. तीन साल पहले मेरा मुम्बई में सिनेमेटोग्राफ़र्स की एसोसियेशन में जाना हुआ वहां मुझे इन कम्पनियों की और से कुछ सीडी और मटेरियल दिया गया जिनमें हालीवुड के कुछ बडे लोग डिजिटल फ़िल्में की बुराई कर रहे थे. जबर्दस्त लाबीइंग थी रे बाबा.
लेकिन बाहर ढेर सारे लोग डिजिटल फ़िल्में बना रहे हैं. जार्ज लूकास जैसे नामचीन फिल्मकार ने अपनी पिछली स्टार-वार्स को डिजिटल फार्मेट में बनाया, और राबर्ट रोड्रिग्ज़ ने अपनी सारी ही फिल्में (डेस्पेराडो, स्पाइ किड्स १-२, वन्स अपान ऎ टाइम इन मेक्सिको) डिजिटल फार्मेट में बनायी हैं. हिन्दुस्तान में भी ढेर सारे लोग स्थानीय भाषाओं में डिजिटल फ़िल्म बना रहे हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि एसा बडे शहरों की बजाय छोटे कस्बों में हो रहा है. ढेठ गांव गवंई शैली में.
आने वाले तीन सालों में बदलाव आयेगा. कुछ नये कैमरे आयेंगे. अभी के मंहगे बिक रहे कैमरे और ज्यादा सस्ते होंगें और लोग डिजिटल फ़िल्में बनायेंगे क्योंकि डिजिटल फ़िल्में बनाना ज्यादा आसान है. जैसे हम कागज और कीबोर्ड पर अपनी अभिव्यक्ति उतार पा रहे हैं, इन डिजिटल फ़िल्मों पर अपनी रचना उतार पायेंगे.
क्या आप इस आने वाली डिजिटल क्रांति के लिये तैयार हैं?
डिजिटल फ़िल्म तकनीक के बारे में अधिक जानकारी के लिये http://cyrilgupta.com or www.maithily.com जरूर जाईये.



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